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सकाम कर्म का त्याग कर देना ही संन्यास है। = श्री दिव्य मोरारी बापू।

सकाम कर्म का त्याग कर देना ही संन्यास है। = श्री दिव्य मोरारी बापू।

गुलाबपुरा (रामकिशन वैष्णव) स्थानीय सार्वजनिक धर्मशाला में चल रहे श्रीदिव्य चातुर्मास सत्संग 
महामहोत्सव में श्रीमद्भागवद्गीता ज्ञानयज्ञ कथा में कथा व्यास-श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर श्री दिव्य मोरारी बापू  ने बताया कि
 भगवान् श्रीकृष्ण ने जब श्रद्धात्रय का वर्णन किया तो अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवान् संन्यास किसे कहते हैं? संन्यास का लक्षण क्या है? ऐसा लगता है कि अर्जुन का आकर्षण संन्यास के प्रति ज्यादा था। प्रारम्भ में भी अर्जुन ने यही कहा था कि- मैं भिक्षा मांगकर गुजारा कर लूंगा पर युद्ध नहीं करूंगा। संन्यास किसे कहते हैं? भगवान ने कहा, पार्थ!
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवायो विदुः।
कुछ विद्वान सकाम कम के त्याग को संन्यास कहते हैं। स्त्री, पुत्र, मान, प्रतिष्ठा पाने के लिये यज्ञ, दान, पूजा, पाठ करना सकाम कर्म कहलाता है। सकाम कर्म का त्याग कर देना ही संन्यास है। कुछ महापुरुष कहते हैं कि कर्म का ही त्याग कर देना, उसका नाम सन्यास है।इस दौरान श्री दिव्य सत्संग चातुर्मास मंडल के व्यवस्थापक घनश्यामदास महाराज, दिव्य सत्संग मंडल अध्यक्ष अरविंद माहेश्वरी सहित सदस्य एवं श्रद्धालुगण मौजूद थे।

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