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अगर ब्राह्मण लोभ में आये तो उसका तेज खत्म हो जाता है! = श्री दिव्य मोरारी बापू

अगर ब्राह्मण लोभ में आये तो उसका तेज खत्म हो जाता है! = श्री दिव्य मोरारी बापू

गुलाबपुरा (रामकिशन वैष्णव)स्थानीय सार्वजनिक धर्मशाला में चल रहे श्रीदिव्य चातुर्मास सत्संग 
महामहोत्सव  श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ कथा में कथा व्यास-श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर श्री दिव्य मोरारी बापू  ने  राजा बलि एवं वामन अवतार की कथा पर वाचन किया, कथा में बताया कि 
राजा बलि के यज्ञ में भगवान दान लेने गये, राजा बलि ने कहा, ले लो महाराज, जो चाहिए आपको। भगवान् ने कहा,  तीन पग जमीन दे दो। राजा बलि ने कहा, इतनी बढ़िया कथा सुनाई फिर भी सिर्फ तीन पग जमीन मांग रहे हो! बलि इतना दान देता है कि दोबारा मांगने की जरूरत ही न पड़े। भगवान् ने कहा,  हम संतोषी ब्राह्मण हैं, हमें तीन पग जमीन ही काफी है। ज्यादा क्या करनी है?
ब्राह्मण में लोभ आये तो उसका तेज खत्म हो जाता है। बलि ने कहा ले लो महाराज, तीन पग ही ले लो। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने कहा यह विष्णु हैं, ब्राह्मण के वेश में विष्णु प्रकट हुए हैं तेरा सब ले जायेंगे। बलि बहुत प्रसन्न हुए, बोले, गुरुदेव! इससे बढ़िया सौभाग्य कब मिलेगा कि दुनियाँ का दाता मेरी यज्ञ मंडप में आया है। फिर मैं मना कर दूं?आप  पहले बता देते, अब मुख से निकल चुका है अब इसे पूरा करूंगा।
दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा तू लक्ष्मी हीन हो जायेगा। बलि ने कहा इसकी कोई चिंता नहीं, लक्ष्मी आने जाने वाली है। शुक्राचार्य कमंडल में घुस गये, भगवान ने ऐसे कुशा चुभाई की उनकी आंख फूट गई। तीन पग जमीन लेने के लिए भगवान ने यह विराट रूप बनाया कि दो पग में तीनों लोग नाप दिये। एक पग बाकी है। बांध दिया ब्रह्म पास से, ठाकुर जी कठोर भी है, परीक्षा लेते समय बड़े कठोर हो जाते हैं। तीनों लोक लेकर ब्रह्म पाश से बांध दिया और लाल आंखें करके बोले, तुम तीन पग नहीं दे सकते हो, कहते हो और मांगो। तीसरा पग दे नहीं तो अभी नरक देता हूं। उसने कहा ठाकुर जी मैं स्वर्ग नरक को एक समान मानता हूं। यह तो जिंदगी के दो पहलू हैं। दिन और रात की तरह आते-जाते हैं। आप मुझे डराइये नहीं, मैं तीसरा पर पूरा करूंगा। कैसे पूरा करेगा? मेरी संपत्ति दो पद में नाप ली है, यह शरीर तीसरे पग में नाप लो, आज से यह शरीर आपको दे दिया। अब भगवान पानी-पानी हो गये। जिसने शरीर दे दिया फिर बाकी क्या बचा? तब भगवान् ने कहा मैं जिस पर कृपा करता हूं,  उसका सब कुछ छीन लेता हूं। जब मैं सब कुछ छीन लेता हूं, फिर भी यदि मेरा भक्त अपने सिद्धांत से नहीं हटा, तब मैं अपना सब कुछ उसे दे देता हूं।
जब उसका सब छीनूंगा तब अपना भी सब उसे देना पड़ेगा। अब तुम हमारे मालिक हो गये और मैं तुम्हारा सेवक हो गया। अब तुम बैठो सिंहासन पर और मैं सेवक बनाकर पहरा दिया करूंगा।वामन रूप धारण करके बाहर दरवाजे पर भगवान खड़े हो गये। जब भगवान् वापिस नहीं आए, तो लक्ष्मी जी बहन बनाकर बलि के पास गई और बलि को राखी बांधी। बलि ने कहा बहन मेरे पास कुछ नहीं रहा। क्योंकि मैं अपना सब कुछ पहले ही नारायण को दे चुका हूं। अब जो कुछ है, सब नारायण का है। यह शरीर भी नारायण का है, तुमने राखी बांधी है कुछ तो ले लो। लक्ष्मी जी दरवाजे की ओर इशारा करके बोली इन्हें मुझे दे दो। इनका तुम्हारा नाता क्या है? लक्ष्मी जी बोली जैसे तुम्हारा भक्त और भगवान का नाता है, हमारा पति और पत्नी का नाता है। लक्ष्मी जी ने अपना रूप प्रगट कर दिया, बलि ने प्रणाम किया और भगवान को कहा कि आप मेरी बहन के साथ जायें। भगवान ने कहा चला जाऊंगा लेकिन सिर्फ एक शरीर से जाऊंगा दूसरे शरीर से यहां रहूंगा। जब तक तुम यहां हो, यही रहूंगा। आज भी भगवान सुतल लोक में है।राजा बलि महाराज के ऊपर करुणा कृपा करके वहीं विराज रहे हैं। इस दौरान कथा में आयोजक घनश्यामदास जी महाराज, सत्संग मंडल अध्यक्ष अरविंद सोमाणी, एडवोकेट विजय प्रकाश शर्मा, सुभाषचंद्र जोशी सहित कई श्रद्धालु, भक्त मौजूद थे।

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