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भगवान् का विस्मरण ही व्यक्ति को माया के समीप पहुंचा देता है। = श्री दिव्य मोरारी बापू

भगवान् का विस्मरण ही व्यक्ति को माया के समीप पहुंचा देता है। = श्री दिव्य मोरारी बापू

बिजयनगर (रामकिशन वैष्णव) श्री श्री 1008 श्री महाकालेश्वर श्री दिव्य मोरारी बापू ने श्रीमद्भागवत कथा में श्री कृष्ण अवतार का विस्तृत वर्णन किया। 
 श्रीकृष्ण कृपा लीला रिसोर्ट तांतपुर रोड जगनेर 
जिला-आगरा (उत्तर-प्रदेश) में चल रही साप्ताहिक श्री मद्भभागवत कथा में कथा व्यास श्री दिव्य मोरारी बापू ने गजेंद्रमोक्ष, समुद्रमंथन,वामन अवतार, श्रीरामावतार, श्रीकृष्णावतार एवं प्राकट्य प्रसंग में बताया कि भगवान श्री कृष्ण का अवतार मथुरा में हुआ। भगवान श्री कृष्ण कंस के कारागार में प्रकट हुए। भाद्रमास, कृष्णपक्ष,अष्टमी तिथि,रोहिणी नक्षत्र,बुधवार दिन, आधी रात को अवतार हुआ। भगवान के आदेश से श्री वासुदेव जी महाराज प्रभु को लेकर गोकुल के लिये चले, इतना ज्यादा अंधेरा था कि अपना हाथ भी न दिखाई पड़े। धीरे-धीरे मेघ गर्जन कर रहे थे, धीरे-धीरे बरसात हो रही थी। शेष जी ऊपर छत्र किये चल रहे थे, ताकि बालकृष्ण पर एक भी बूंद जल गिरने न पावे।शेष जी के शिर की मणियों से श्री वासुदेव जी को मार्ग का प्रकाश भी मिल रहा था। यमुना पार करके श्री वासुदेव जी महाराज भगवान को मां यशोदा के पास गोकुल पहुंचते हैं, वापस योग माया को लेकर मथुरा पहुंच जाते हैं। पुनः कारागार के ताले बंद हो गये, महाराज वासुदेव को हथकड़ी वीडियां लग गई। ये तो सीधी सी बात है कि जीव जब भगवान के समीप होता है तो उसके सारे बंधन खुल जाते हैं और जीव जब माया के समीप हो जाता है तो पुनः बंधन लग जाते हैं।आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान के समीप रहना क्या है? और माया के समीप रहना क्या है? भगवान का निरंतर स्मरण ही भगवान के समीप रहना है और भगवान का विस्मरण ही व्यक्ति को माया के समीप पहुंचा देता है। यही बंधन का हेतु है, सारी विपत्तियों के मूल में भगवान का विस्मरण है।
विपदो नैव विपदः, संपदो नैव संपदः। विपद विस्मरणं विष्णो संपद नारायणस्मृतिः।।
विपत्ति का नाम विपत्ति नहीं है। संपत्ति का नाम संपत्ति नहीं है। भगवान के विस्मृति का नाम ही विपत्ति है और भगवान की स्मृति का नाम ही संपत्ति है। 
कथा-कीर्तन, नवधा-भक्ति, एवं नामजप से भगवान की स्मृति सदैव बनी रह सकती है। कथा में आयोजक व व्यवस्थापक श्री घनश्यामदास जी महाराज सहित कई श्रद्धालु मौजूद थे।

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